देहरादून: उत्तराखंड में मंत्री व नेता जैविक जैविक का कितना भी ढोल पीट लें लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है , प्रदेश में ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन का कार्य बंद हो चुका है और राज्य में हो रही जैविक खेती के उत्पादों का राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में बिना ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन के बिकना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जाएगा यह बात आज एआईसीसी सदस्य व उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने अपने कैंप कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत में कही।
सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन की आंतरिक प्रक्रिया इंटरनल कंट्रोल सिस्टम ( आई सी एस) व उत्तराखंड सीड सर्टिफिकेशन एजेंसी ( यूसोका ) का कार्य पिछले छह महीनों से ठप्प हो गया है और इसका कारण है कि प्रदेश के कृषि मंत्रालय ने भारत सरकार को उत्तराखंड में चल रही जैविक खेती के लिए एन सी ओ एल के साथ चल रहे करार के लिए वर्ष २००५ २६ के लिए बजटीय प्रस्ताव ही नहीं भेजा जिससे केंद्र से प्राप्त हुए वाली राशि जो ९० व १० के अनुपात में केंद्र व राज्य के हिस्से आती है वो भेजी ही नहीं गई जिससे अब पूरी योजना ही खटाई में पड़ गई है और वे पहाड़ी उत्पाद जो ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन के बल पर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अपना स्थान बना रहे हैं वे अब ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन ना होने की वजह से बिकने मुश्किल हो जायेंगे।
सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि जैविक खेती के कॉन्सेप्ट को वर्ष २००३ में कांग्रेस के नेतृत्व वाली तिवारी सरकार ने जैविक बोर्ड बना कर पंख लगाए थे और वर्ष २०१५ १६ में कांग्रेस की ही हरीश रावत सरकार के जमाने में स्थानीय उत्पाद कोदा मंडवा झगोरा आदि ने बाजार में अपनी पहचान बनाई और देश दुनिया में इनकी मांग इतनी बड़ी कि इनकी खेती छोड़ चुके लोगों ने इनकी खेती शुरू की। धस्माना ने कहा कि वर्तमान सरकार लगता है प्रदेश में ऑर्गेनिक बोर्ड को ही खत्म करने पर आमदा है लेकिन कांग्रेस इसे खत्म नहीं होने देगी और वे शीघ्र इस मुद्दे पर प्रदेश के मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए उनसे शीघ्र मुलाकात कर प्रभावी कार्यवाही करने की मांग करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर जैविक खेती से जुड़े किसानों के साथ मिल कर आंदोलन भी करेंगे।







